Friday, 3 August 2018

भगवान रामचंद्र की मृत्यु का रहस्य

त्रेता युग के अंत में जब भगवान राम और सीता जी वनवास से वापस लौटे, तब श्रीराम और माता सीता का राज्यभिषेक कर दिया गया ।
किंतु प्रजा में माता सीता को लेकर आशंका थी । प्रजा का कहना था कि माता सीता लंका नरेश रावण के यहां 13 वर्ष और 11 महीने गुजार कर आई है फिर भी वह पवित्र कैसे हो सकती है ? माता सीता की अग्नि परीक्षा वन में वानरों एवं भालुओं के मध्य की गई थी, क्या वहां राम और लक्ष्मण के सिवाय कोई और मनुष्य उपलब्ध था ?

इस प्रकार के आरोपों का जब राजा रामचंद्र को पता चलता है तब वह माता सीता का परित्याग कर देते हैं। माता सीता जंगल में भटकती रहती है तभी उन्हें वाल्मीकि जी अपने आश्रम में शरण देते हैं। उस समय माता सीता पेट से रहती है आश्रम में लव और कुश नामक दो बालकों को जन्म देती है । तत्पश्चात लव कुश द्वारा अयोध्या की प्रजा पर अनेक प्रकार के लांछन लगाए जाने कारण अयोध्यावासी माता सीता को वापस लाने की मांग करते हैं। जब माता सीता महाराज रामचंद्र के पास पहुंचती है तो, अपने पर हुए इतने अत्याचारों को देखकर वह धरती माता की गोद में समा जाती है। उसके पश्चात भगवान काल अयोध्या आते हैं जो श्रीराम को कहते हैं कि हे प्रभु आपका पृथ्वी पर आने का उद्देश्य संपन्न हो चुका है यदि आप रहना चाहे तो रह सकते हैं किंतु यदि आप अपने लोर को पधारें तो हम सभी धन्य हो जाएंगे। तब श्री रामचंद्र जी सरयू नदी में स्वयं को जलमग्न कर देते हैं इस प्रकार रामचंद्र जी पृथ्वी से अपना अवतार कार्य पूर्ण करके क्षीर सागर में वापस चले जाते हैं।

 इस प्रकार हमें पता चलता है कि भगवान रामचंद्र ने काल के आग्रह को स्वीकार करते हुए अपने आप को जलमग्न कर लिया था ।

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